Tuesday, 12 April 2016

जय माँ बायण

पाटण गढ़ सूं उड़ हंसौ, मेवाड़ मांही आयौ
मरु री धरती ने देख ,  मन उणरो चकरायौ

जौहर शाका नित हुवे ,  आ धरती अणजाणी
भड़ भगता री बात न पूछौ, लहू बहे ज्यूँ पाणी

गढ़ मोटो मेवाड़ रो ,  अद्भुत किलो निजर आयों
हंसौ उड़ किला में बैठों , माँ बायण रो थान थपायों

मोटी मात भवानी म्हारी , बप्पा लक्ष्मण गुण गावै
पल में दुखड़ा दूर करे , अपार  सुख सरसावै

नर नारी दर्शन ने आवे , राखे माँ चतर छाया
इण देवी री बात न पूछों , मोटी माँ री माया

रोगी भोगी सब आवे , सुखी हो जावे काया
जरणी मात जगदम्बा म्हारी , प्यारी लागै भाया

बेटा ज्यारा खेतल देव , सारंगवास रा निवासी
श्वान सवारी ज्यारे शोभती , महिमा ज्यारि साची

लुटण राज मेवाड़ रों  , दुष्ट ख़िलजी आयौ
भुज भवानी भांजिया , ख़िलजी अति घबरायौ

अन्न धन्न भण्डार भरी , सेवक सहाय आई
सुमरिया पार उतारिया , मातेश्वरी मेवाड़ी माई

अनु उतारे आरती ,  मातेश्वरी थू मतवाळी
महेंद्र मनाया आवजों , मात चित्तोड़ गढ़ वाळी ।

Monday, 21 March 2016

श्री ब्राह्मणी माताजी मंदिर मुन्दियाड़

श्री ब्राह्मणी माताजी मंदिर मुन्दियाड़

नागौर से २५ कि॰मी॰ की दूरी पर स्थित मून्दियाड़ गांव है। इस गांव को महेश्वरियों ने बसाया था। इस गांव में प्राचीन ब्राह्मणी माता का मन्दिर है। इन्हे मून्दड़ों की माता भी कहते हैं। लाल पत्थरों से निर्मित यह मन्दिर शिल्पकला का अनुपम उदाहरण है। मन्दिर के समीप ही लाल पत्थरों से निर्मित ब्र्ह्मा जी की खण्डित प्रतिमा स्थित है। इसलिए अनुमान लगाया जाता है कि यह मन्दिर मूलतः ब्रह्माजी का रहा होगा किन्तु मध्यकाल में मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा आक्रमण कर इसे खण्डित किये जाने के उपरान्त ब्रह्माजी की पूजा अर्चना बन्द हो गई तथा बाद में स्थापित ब्रह्माणी माता मून्दड़ों की माता के नाम से पूजी जाने लगी। वि॰सं॰ 1925 में ब्राह्मणी माता की चार भुजा धारी  नवीन प्रतिमा इस मन्दिर में स्थापित की गई।

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Thursday, 17 March 2016

श्री बाण माताजी सलूम्बर , उदयपुर

सलूम्बर राज महल में विराजमान श्री बाण माताजी की महिमा ही निराली हैं।
मेवाड़ की सेना में " हरावल " पंक्तीं के अधिकारी चूण्डावतों के पाटवी ठिकाणा सलूम्बर राज महल में राजपरिवार द्वारा स्थापित मन्दिर हैं , आजादी से पूर्व इस मंदिर में मातेश्वरी की पूजा स्वयं रावत जी एवम् समस्त राज परिवार द्वारा की जाती थी।
किवदंतियों के अनुसार एक बार रावत जी सलूम्बर से स:परिवार उदयपुर आ गए , वे सलूम्बर से बाण माताजी को भी अपने साथ लेकर आ गए , तब बाण माताजी वहा से स्वयं यहा सलूम्बर आकर वापस विराजमान हो गए ।
कुछ समय के लिए  मन्दिर में ज्यादा संख्या में चमगादड़ों ने अपना बसेरा बना लिया था , इसकी वजह से मंदिर में किसी का आना जाना नही रहता था ।
अभी माँ की कृपा से मन्दिर में एक भी चमगादड़ नही है , मातेश्वरी के पुजारी जी एवम् ग्रामवासि बताते है कि मातेश्वरी दिन में तीन रूप करती है , और इस अद्भुत चमत्कार को   " श्री बाण माताजी भक्त मंडल जोधपुर " के सदस्यों और मातेश्वरी के परम् आराधिका अनुराधा जी गहलोत ने माँ के सन्मुख रह कर यह चमत्कार देखा है । मन्दिर के ऊपरी भाग में

कालिका माताजी का मंदिर हैं जहा रावत जी स्वयं नवरात्रि में उदयपुर से आकर यहा मातेश्वरी की पूजा अर्चना करते है । मंदिर परिसर में यहा के बुढ़े बुजुर्गो ने बताया कि यहा एक नाग नागिन का जोड़ा भी रहता है , जिनमे नाग देवता के बड़ी बड़ी मुछे भी है , कई सालों से यह नाग नागिन का जोड़ा है लेकिन किसी को आज तक बिना कारण नुकसान नही पहुचाया ।
सलूम्बर में विराजित बाण माताजी युद्धों की देवी हैं , अक्सर युद्धों में जाते समय मेवाड़ की सेना एकलिंग जी का नाम लेकर युद्ध के लिए निकलती हैं  लेकिन  हरावल पँक्ति के हकदार चुण्डावत ख़ास कर चूण्डावतों का पाटवी ठिकाणा सलूम्बर में सर्व प्रथम अपनी कुलदेवी की आराधना युद्ध में साथ चल सहायता करने का आह्वान करते थे ।
वैसे तो बाण माताजी की हंस की असवारी हैं लेकिन  यहा मातेश्वरी की सिंह की असवारी है , बाण माताजी भक्तों का उद्धार करने वाली संकट हरने वाली मैया आपके श्री चरणों में प्रणाम ।

माँ से एक निवेदन : प्रणतानां प्रसीद त्वं देवि विश्वार्तिहारिणि।
त्रैलोक्यवासिनामीडये लोकानां वरदा भव || :-

विश्व की पीडा दूर करनेवाली देवि! हम तुम्हारे चरणों पर पडे हुए हैं, हम पर प्रसन्न हो ओ।
त्रिलोकनिवासियों की पूजनीया परमेश्वरि ! सब
भक्तो को वरदान दो |

दोहा :-
रण देवी थू दुरग देवी , भगत भूप घणा भाय ।
शगति सलूम्बर वाळी सुमरिया , कष्ट सब मिट जाय ।।

Tuesday, 16 February 2016

श्री बाण माताजी मंदिर दोलपुरा , प्रतापगढ़ ( राज.)

श्री बाण माताजी मन्दिर दोलपुरा , प्रतापगढ़ मे विराजमान श्री बाण माताजी 
मन्दिर की प्राण प्रतिष्ठा दो वर्ष पूर्व ही एकलिंग दीवान महाराणा श्री महेन्द्र सिंह जी और उत्तम स्वामी जी महाराज के सानिध्य में हुआ । 



विणती वरदायीनी मावड़ी , बायण सुणों पुकार।
द्वारे थोरे आविया , तारों तारणहार ।।

Saturday, 2 January 2016

श्री वरदायिनी माताजी मंदिर रूपाल ( ब्राह्मणी माता का स्वरूप ) , गांधीनगर ( गुज.)

श्री वरदायिनी माता के नाम से विख्यात श्री ब्राह्मणी माताजी का मंदिर जहाँ बहती है घी की नदियाँ
मंदिर में बहती है घी की नदी: जानें
हमारा देश भारत जिसे कभी सोने की चिड़िया के नाम से जाना जाता था, ऐसा कहते हैं कि प्राचीन काल में भारत में दूध, घी की नदियां बहती थी। वैसे पुराने समय में घी शब्द का प्रयोग ही प्राचीन भारत की उस समृद्धि को व्यक्त करने के लिए किया जाता था जहां तक विश्व का कोई देश आधुनिक युग में भी शायद नहीं पहुंच पाया है। आज हम आपको एक ऐसे मंदिर की कहानी बताने जा रहे हैं जहां आज भी घी की नदी बहती है।
जी हां, यह बिल्कुल सच है। गुजरात, जिसके लिए कहा जाता है कि यहां दूध की नदियां बहती हैं उसी गुजरात में साल में एक रात ऐसी आती है जब दूध की ही नहीं बल्कि घी की नदियां बहती हैं। गुजरात के गांधीनगर में एक छोटा सा गांव है रूपाल, जहां हर साल पल्ली उत्सव मनाया जाता है। इसमें मां वरदायिनी की पूजा की जाती है।
पल्ली जो सिर्फ एक प्रकार का लकड़ी का ढांचा है, बताया जाता है कि इसमें 5 ज्योत प्रज्ज्वलित होती है और इस पर घी का अभिषेक किया जाता है। वैसे तो सामान्य तौर पर माता की ज्योत में घी का ही अर्पण किया जाता है, लेकिन पल्ली उत्सव में जिस तरह घी का चढ़ावा चढ़ता है वो अपने आप में अनोखा और देखने लायक होता है। यहां हर साल करीब 5 लाख किलो शुद्ध घी माता पर अर्पित किया जाता है और माता पर घी चढ़ाकर लोग अपनी मन्नत मांगते हैं।
हर साल नवरात्रि के आखिरी दिन मां वरदायिनी की रथ यात्रा निकाली जाती है, जो पूरे गांव में घूमती है। इसमें करीब 12 लाख लोग मां के दर्शन करते हैं और बाल्टियां और बैरल भर घी माता पर अर्पित करते हैं। बताया जाता है कि इस गांव में 27 चौराहे हैं। जहां बड़े-बड़े बर्तनों, बैरल में घी भरकर रखा जाता है। जैसे ही पल्ली वहां आती है लोग इस घी से माता की पल्ली पर अभिषेक करते हैं। अभिषेक करते ही यह घी नीचे जमीन पर गिर जाता है, जिस पर इस गांव के ही एक खास समुदाय का हक रहता है। इस समुदाय के लोग इस घी को इकट्ठा कर इसे पूरे साल इस्तेमाल करते हैं।
बताया जाता है कि इस चढ़ावे को चढ़ाते वक्त लोग इस घी से नहा जाते हैं, लेकिन आश्चर्य में डालने वाली बात यह है कि इस घी का दाग कभी भी कपड़ों पर नहीं पड़ता। जमीन पर पड़े इस घी पर कभी कोई जानवर मुंह तक नहीं मारता। ये बातें आपको जितनी हैरान कर रही हैं उससे ज्यादा हैरान करने वाली यहां आने वाले भक्तों की मन्नतों की कहानियां हैं। कहते हैं यहां आने वाले भक्तों की हर मन्नत पूरी होती है।
रुपाल गांव की वरदायिनी माता की यह कहानी पांडवों से जुड़ी हुई है। यहां जलती ये पांच ज्योत पांडवों को ही दर्शाती है। बताया जाता है कि पांडव अपने अज्ञातवास में यहीं आकर रुके थे और अपने शस्त्र छुपाने के लिए उन्होंने वरदायिनी मां का आह्वान किया था। घी का अभिषेक करने पर वरदायिनी मां यहां उत्पन्न हुईं और उन्होंने पांडवों को वरदान दिया। पांडवों ने तब संकल्प किया था कि हर नवरात्रि की 9वीं रात को वरदायिनी माता के रथ को निकालकर उसे घी का अभिषेक करवाएंगे, तभी से यह परंपरा लगातार चली आ रही है।
इस परंपरा से लोगों की मन्नतें पूरी होती हैं या नहीं इस बारे में तो कुछ नहीं कहा जा सकता, लेकिन इस आस्था से यह जरूर साफ हो जाता है कि भले ही एक रात के लिए ही सही पर भारत में एक गांव ऐसा है जिसमें घी की नदियां बहती हैं।
जय माँ ब्राह्मणी

Sunday, 27 December 2015

श्री ब्राह्मणी माताजी और श्री कालिका माताजी ( भवाल माताजी )

मित्रों हम आपको माँ के इस @[306557149512777:] पेज के माध्यम से बाण माताजी के विभिन्न मंदिरों की जानकारी देते एवं माँ बायण का इतिहास बताते आ रहे है , आज हम आपको भवाल माताजी के नाम से विख्यात श्री ब्राह्मणी ( बाण , बायण ) माताजी और श्री कालिका माताजी के इस मंदिर के बारें में बताएँगे । इस मंदिर में कालिका माताजी के सन्मुख ही श्री बाण माताजी विराजमान है ।
भँवाल माँ का इतिहास
यु तो इतिहास बनाने वाली का इतिहास कोई नहीं बता सकता परन्तु कथा साहित्य लिखने से मनुष्य अपनी जानकारी बढ़ा सकता है और इसी सन्दर्भ में हम माँ के भँवाल धाम पर अवतारित होने की गाथा को लिख रहे है !
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जय भंवाल माँ
माँ भवानी की कथा
दन्त कथा के अनुसार सत-युग में भक्त की करुण पुकार सुन माँ भंवाल ने , जो की उस समय काठियावाड़ के भंवाल गढ़ गांव (तत्कालीन जिला नागौर, राजस्थान ) में एक खेजड़े के निचे से धरा फाड़ के मूर्ति रूप में प्रकट हुई और आकाशवाणी करके बतलाया के हम दो बहने कालका व् ब्राह्मणी के रूप में आई है और ये मूर्ति हमारी निशानी रहेगी !! जब जब भक्त (सभी जीव-जंतु, पशु-पक्षी ) यहाँ आके सच्चे मन से हमें पुकारेंगे हम अवश्य ही उनकी  मनसा पूर्ण करेंगी !!
शिलालेख और जैसे हमारे बड़ो ने बताया ......
विक्रम संवत - १०५० के आस - पास एक डाकुओं की बड़ी टुकड़ी को उस समय के राजा की सेना ने घेर लिया था !! वह डाकू माँ भवानी के बहुत बड़े भक्त हुआ करते थे और मृत्यु निकट दिख रही थी !! तभी उन्हें सामने माँ कालका - ब्राह्मणी की मूर्ति का साक्षात्कार हुआ !
होरम पल्ला पसार के माँ के सामने नतमस्तक हो कहा " हे माँ अब हमारे प्राण तुम्हारे हाथ है, अगर हमे आपकी दया प्राप्त हुई और हमारे प्राण आपने बचा लिए तो माँ जो कुछ हमारे समक्ष है सब कुछ आपको समर्पित कर देंगे !! और जैसे ब्रह्मा जी कहते है " यम यम चिन्तयते कामम् तम तम प्राप्नितो निश्चितं " अर्थात जिस जिस काम की प्राणी तू कामना करेगा माँ उसे अवश्य की सिद्ध कर देंगी सो माँ ने सभी डाकुओं को भेड बकरी में बदल दिया और सामने होते हुए भी भर जोर कोशिश के बाद भी कुछ हाथ नहीं लगा !!
अब वचन अनुसार जो भी कुछ डाकुओं के पास था माँ को समर्पित किया! परन्तु प्रसाद चढाने के लिए कुछ भी नहीं होने के कारण बहुत निराश हो रहे थे! तभी मन में विचार आया के माँ तो प्रेम भावना से प्रसन होती है ये मदिरा को हम अगर प्रेम भावना से चढ़ाएंगे तो क्या माँ ग्रहण करेंगी ?
झिज्ञासा और वात्सल्य से प्रेरित हो माँ को एक प्याला मदिरा का ज्यों ही चढाने के लिए बढ़ाया तो आश्चर्य चकित होगये के प्याला स्वयं ही खाली हो गया, उत्सुकता वष दूसरा प्याला बढ़ाया और वो भी खाली परन्तु जैसे ही तीसरा प्याला आगे बढ़ाया तो आधा ही खाली हुआ !! तो डाकू सोच में पड़ गए के आखिर क्या गलती रह गयी जो माँ ने तीसरा प्याला नहीं पीया !! तब माँ ने दर्शाया के तुम्हारे प्रेम का प्रसाद है इसलिए जो भी तुम ने दिया मैंने ग्रहण किया अब बचा हुआ आधा प्याला भैरों को चढ़ा दो और आज से ये प्रसाद(तामसिक*) मुझे (अर्थात कालका माँ ) चढ़ेगा !! और माँ ब्राह्मणी के आदेशानुसार उन्हें फल फूल मिठाइयां चढ़ाई जाती है !!
* इसी लिए पहले के समय मदिरा के अलावा रक्त का प्रसाद भी चढ़ता था !!
धन्य है वो डाकू जो माँ को इतने सच्चे मन से पुकारा की उन्हें दर्शन दे दिया !!
और इसी चमत्कार को नमस्कार करते हुए डाकुओं ने दृढ़ संकलप लिया के वे यहाँ माँ के भव्य मंदिर का निर्माण करेंगे और ६० वर्षों तक भक्ति में लीन हो कर उन्हों ने माँ का अद्भुत मंदिर खड़ा किया !! और विक्रम संवत १११९ में मंदिर का निर्माण कार्य पूरा हुआ !! माँ की भक्ति की शक्ति ही प्राप्त थी उन्हें इसी लिए बिना किसी औजार व् वाहन के साधन के भी पांच पांच हज़ार किलो तक के पत्थर को बिना चुना और सीमेंट के जोड़ दिया !! और बेजोड़ नकाशी का कार्य जो आज हम बिना आधुनिक उपकरण के हम सोच भी नहीं सकते उन्होंने साकार कर दिया !! माँ के पुण्य प्रताप से उन्होंने अपने छुपने के लिए माँ के पास ही रहना सबसे उत्तम समझा इसीलिए माँ के निज आले के ऊपर ही एक गुफा बनायीं जो की आज भी विधमान है !!
इसके पश्च्यात मंदिर में कई बदलाव भक्तो द्वारा समय समय पे किये गए !
माँ आज भी अपने बच्चों से प्रसन होकर तामसिक भोग लगाती है और सभी इच्छाएं पूर्ण करती है !!
यह हमारे पूर्व जनम के संस्कार ही है के हमें माँ के चरणो में ठिकाना मिला और माँ ने हमे (राजपूत/ बैंगाणी/ अन्य ओसवाल /झांझरा......)को अपने कुल में पैदा किया !! ऐसी कुल धिराणी पा के हम तो धन्य हो गए !! माँ यो ही हम पर मेहर बरसाती रहे और हम यु ही माँ की भक्ति में दुबे रहे ...इसी के साथ

" काळी कल्याणी मावड़ी , लेह ढ़ाई प्याला रो भोग ।
ब्राह्मणी बेठी साथ में , भजिया मिटे सब रोग ।। "

जय श्री बाण माताजी
जय श्री कालिका माताजी
जय श्री सोनाणा खेतलाजी
जय श्री एकलिंग नाथ जी

Saturday, 26 December 2015

माँ ब्राह्मणी मंदिर - राजा सुरथ से जुड़े इतिहास

मां ब्राह्मणी मंदिर : राजा सूरथ से जुड़े हैं इतिहास
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जय माँ बाण/बायण/ब्राह्मणी माताजी
हनुमानगंज (बलिया) : जिला मुख्यालय से पांच किमी उत्तर बलिया-सिकंदरपुर मुख्य मार्ग पर ब्रह्माइन गांव स्थित मां ब्राह्मणी देवी का प्राचीन मंदिर श्रद्धालुओं के बीच आस्था का केंद्र ¨बदु बना हुआ है। मान्यता है कि सच्चे मन से जिस किसी ने कुछ मांगा, उसकी मनोकामना जरूर पूरी होती है। नवरात्र में ही नहीं बल्कि अन्य अवसरों पर भी दर्शन-पूजन को दूर-दराज से लोग यहां आते हैं। दुर्गा सप्तशती व मारकंडेय पुराण में वर्णित है कि भवन के राजाओं से हार कर राजा सूरथ कुछ सैनिकों के साथ शिकार खेलने के बहाने निकल गए। आज जहां ब्रह्माइन गांव स्थित है कालांतर में वहां जंगल था। वहीं रुके और सैनिकों से पानी लाने को कहे। सैनिकों को कुछ दूर चलने पर एक सरोवर दिखाई दिया। वहां से पानी लाकर उन्होंने राजा को दिया। राजा युद्ध में घायल हो गए थे और शरीर के कई जगह से मवाद निकल रहा था। राजा ने जब उस पानी का स्पर्श किया तो वहां का कटा व मवाद युक्त घाव ठीक हो गया। इस घटना से चकित राजा ने सैनिकों को उस स्थान पर ले चलने को कहा जहां से वे जल लाए थे। वहां पहुंचने के बाद राजा ने उस सरोवर में छलांग लगा दी जिससे उनका पूरा शरीर सोवरन हो गया वहां पर राजा ने विचार किया कि निश्चय ही ये स्थान कोई पवित्र जगह है। सैनिकों को भेजकर राजा अकेले ही विचरण करने लगे वहीं पर उन्हें एक आश्रम दिखाई दिया वह आश्रम महर्षि मेधा का था। महर्षि से उचित सत्कार पाकर राजा उनके आश्रम में विचरण करने लगे। कुछ दिनों बाद वहां पर एक समाधि नाम का वैश्य आया जिसे उसके परिजनों ने धन के लोभ में घर से निकाल दिया था। राजा सूरथ व समाधि ने ऋषि मेधा से शांति पाने का उपाय पूछा। ऋषि ने आदि शक्ति की उपासना को कहा। वहीं पर राजा सूरथ व समाधि ने तीन वर्षों तक मां ब्रह्माणी की तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर मां ब्रह्माणी देवी अवतरित हुई दोनों को मनोवांछित फल देकर अभिलाशित किया। राजा सूरथ की तपोस्थली सुरहा के नाम से विख्यात हुई और उससे निकलने वाला एक मात्र नाला जिसके जल से राजा का कोढ़ जैसा शरीर सुंदर हो गया, वह कटहल नाले के नाम से विख्यात हुआ।

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