Tuesday, 16 February 2016

श्री बाण माताजी मंदिर दोलपुरा , प्रतापगढ़ ( राज.)

श्री बाण माताजी मन्दिर दोलपुरा , प्रतापगढ़ मे विराजमान श्री बाण माताजी 
मन्दिर की प्राण प्रतिष्ठा दो वर्ष पूर्व ही एकलिंग दीवान महाराणा श्री महेन्द्र सिंह जी और उत्तम स्वामी जी महाराज के सानिध्य में हुआ । 



विणती वरदायीनी मावड़ी , बायण सुणों पुकार।
द्वारे थोरे आविया , तारों तारणहार ।।

Saturday, 2 January 2016

श्री वरदायिनी माताजी मंदिर रूपाल ( ब्राह्मणी माता का स्वरूप ) , गांधीनगर ( गुज.)

श्री वरदायिनी माता के नाम से विख्यात श्री ब्राह्मणी माताजी का मंदिर जहाँ बहती है घी की नदियाँ
मंदिर में बहती है घी की नदी: जानें
हमारा देश भारत जिसे कभी सोने की चिड़िया के नाम से जाना जाता था, ऐसा कहते हैं कि प्राचीन काल में भारत में दूध, घी की नदियां बहती थी। वैसे पुराने समय में घी शब्द का प्रयोग ही प्राचीन भारत की उस समृद्धि को व्यक्त करने के लिए किया जाता था जहां तक विश्व का कोई देश आधुनिक युग में भी शायद नहीं पहुंच पाया है। आज हम आपको एक ऐसे मंदिर की कहानी बताने जा रहे हैं जहां आज भी घी की नदी बहती है।
जी हां, यह बिल्कुल सच है। गुजरात, जिसके लिए कहा जाता है कि यहां दूध की नदियां बहती हैं उसी गुजरात में साल में एक रात ऐसी आती है जब दूध की ही नहीं बल्कि घी की नदियां बहती हैं। गुजरात के गांधीनगर में एक छोटा सा गांव है रूपाल, जहां हर साल पल्ली उत्सव मनाया जाता है। इसमें मां वरदायिनी की पूजा की जाती है।
पल्ली जो सिर्फ एक प्रकार का लकड़ी का ढांचा है, बताया जाता है कि इसमें 5 ज्योत प्रज्ज्वलित होती है और इस पर घी का अभिषेक किया जाता है। वैसे तो सामान्य तौर पर माता की ज्योत में घी का ही अर्पण किया जाता है, लेकिन पल्ली उत्सव में जिस तरह घी का चढ़ावा चढ़ता है वो अपने आप में अनोखा और देखने लायक होता है। यहां हर साल करीब 5 लाख किलो शुद्ध घी माता पर अर्पित किया जाता है और माता पर घी चढ़ाकर लोग अपनी मन्नत मांगते हैं।
हर साल नवरात्रि के आखिरी दिन मां वरदायिनी की रथ यात्रा निकाली जाती है, जो पूरे गांव में घूमती है। इसमें करीब 12 लाख लोग मां के दर्शन करते हैं और बाल्टियां और बैरल भर घी माता पर अर्पित करते हैं। बताया जाता है कि इस गांव में 27 चौराहे हैं। जहां बड़े-बड़े बर्तनों, बैरल में घी भरकर रखा जाता है। जैसे ही पल्ली वहां आती है लोग इस घी से माता की पल्ली पर अभिषेक करते हैं। अभिषेक करते ही यह घी नीचे जमीन पर गिर जाता है, जिस पर इस गांव के ही एक खास समुदाय का हक रहता है। इस समुदाय के लोग इस घी को इकट्ठा कर इसे पूरे साल इस्तेमाल करते हैं।
बताया जाता है कि इस चढ़ावे को चढ़ाते वक्त लोग इस घी से नहा जाते हैं, लेकिन आश्चर्य में डालने वाली बात यह है कि इस घी का दाग कभी भी कपड़ों पर नहीं पड़ता। जमीन पर पड़े इस घी पर कभी कोई जानवर मुंह तक नहीं मारता। ये बातें आपको जितनी हैरान कर रही हैं उससे ज्यादा हैरान करने वाली यहां आने वाले भक्तों की मन्नतों की कहानियां हैं। कहते हैं यहां आने वाले भक्तों की हर मन्नत पूरी होती है।
रुपाल गांव की वरदायिनी माता की यह कहानी पांडवों से जुड़ी हुई है। यहां जलती ये पांच ज्योत पांडवों को ही दर्शाती है। बताया जाता है कि पांडव अपने अज्ञातवास में यहीं आकर रुके थे और अपने शस्त्र छुपाने के लिए उन्होंने वरदायिनी मां का आह्वान किया था। घी का अभिषेक करने पर वरदायिनी मां यहां उत्पन्न हुईं और उन्होंने पांडवों को वरदान दिया। पांडवों ने तब संकल्प किया था कि हर नवरात्रि की 9वीं रात को वरदायिनी माता के रथ को निकालकर उसे घी का अभिषेक करवाएंगे, तभी से यह परंपरा लगातार चली आ रही है।
इस परंपरा से लोगों की मन्नतें पूरी होती हैं या नहीं इस बारे में तो कुछ नहीं कहा जा सकता, लेकिन इस आस्था से यह जरूर साफ हो जाता है कि भले ही एक रात के लिए ही सही पर भारत में एक गांव ऐसा है जिसमें घी की नदियां बहती हैं।
जय माँ ब्राह्मणी

Sunday, 27 December 2015

श्री ब्राह्मणी माताजी और श्री कालिका माताजी ( भवाल माताजी )

मित्रों हम आपको माँ के इस @[306557149512777:] पेज के माध्यम से बाण माताजी के विभिन्न मंदिरों की जानकारी देते एवं माँ बायण का इतिहास बताते आ रहे है , आज हम आपको भवाल माताजी के नाम से विख्यात श्री ब्राह्मणी ( बाण , बायण ) माताजी और श्री कालिका माताजी के इस मंदिर के बारें में बताएँगे । इस मंदिर में कालिका माताजी के सन्मुख ही श्री बाण माताजी विराजमान है ।
भँवाल माँ का इतिहास
यु तो इतिहास बनाने वाली का इतिहास कोई नहीं बता सकता परन्तु कथा साहित्य लिखने से मनुष्य अपनी जानकारी बढ़ा सकता है और इसी सन्दर्भ में हम माँ के भँवाल धाम पर अवतारित होने की गाथा को लिख रहे है !
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जय भंवाल माँ
माँ भवानी की कथा
दन्त कथा के अनुसार सत-युग में भक्त की करुण पुकार सुन माँ भंवाल ने , जो की उस समय काठियावाड़ के भंवाल गढ़ गांव (तत्कालीन जिला नागौर, राजस्थान ) में एक खेजड़े के निचे से धरा फाड़ के मूर्ति रूप में प्रकट हुई और आकाशवाणी करके बतलाया के हम दो बहने कालका व् ब्राह्मणी के रूप में आई है और ये मूर्ति हमारी निशानी रहेगी !! जब जब भक्त (सभी जीव-जंतु, पशु-पक्षी ) यहाँ आके सच्चे मन से हमें पुकारेंगे हम अवश्य ही उनकी  मनसा पूर्ण करेंगी !!
शिलालेख और जैसे हमारे बड़ो ने बताया ......
विक्रम संवत - १०५० के आस - पास एक डाकुओं की बड़ी टुकड़ी को उस समय के राजा की सेना ने घेर लिया था !! वह डाकू माँ भवानी के बहुत बड़े भक्त हुआ करते थे और मृत्यु निकट दिख रही थी !! तभी उन्हें सामने माँ कालका - ब्राह्मणी की मूर्ति का साक्षात्कार हुआ !
होरम पल्ला पसार के माँ के सामने नतमस्तक हो कहा " हे माँ अब हमारे प्राण तुम्हारे हाथ है, अगर हमे आपकी दया प्राप्त हुई और हमारे प्राण आपने बचा लिए तो माँ जो कुछ हमारे समक्ष है सब कुछ आपको समर्पित कर देंगे !! और जैसे ब्रह्मा जी कहते है " यम यम चिन्तयते कामम् तम तम प्राप्नितो निश्चितं " अर्थात जिस जिस काम की प्राणी तू कामना करेगा माँ उसे अवश्य की सिद्ध कर देंगी सो माँ ने सभी डाकुओं को भेड बकरी में बदल दिया और सामने होते हुए भी भर जोर कोशिश के बाद भी कुछ हाथ नहीं लगा !!
अब वचन अनुसार जो भी कुछ डाकुओं के पास था माँ को समर्पित किया! परन्तु प्रसाद चढाने के लिए कुछ भी नहीं होने के कारण बहुत निराश हो रहे थे! तभी मन में विचार आया के माँ तो प्रेम भावना से प्रसन होती है ये मदिरा को हम अगर प्रेम भावना से चढ़ाएंगे तो क्या माँ ग्रहण करेंगी ?
झिज्ञासा और वात्सल्य से प्रेरित हो माँ को एक प्याला मदिरा का ज्यों ही चढाने के लिए बढ़ाया तो आश्चर्य चकित होगये के प्याला स्वयं ही खाली हो गया, उत्सुकता वष दूसरा प्याला बढ़ाया और वो भी खाली परन्तु जैसे ही तीसरा प्याला आगे बढ़ाया तो आधा ही खाली हुआ !! तो डाकू सोच में पड़ गए के आखिर क्या गलती रह गयी जो माँ ने तीसरा प्याला नहीं पीया !! तब माँ ने दर्शाया के तुम्हारे प्रेम का प्रसाद है इसलिए जो भी तुम ने दिया मैंने ग्रहण किया अब बचा हुआ आधा प्याला भैरों को चढ़ा दो और आज से ये प्रसाद(तामसिक*) मुझे (अर्थात कालका माँ ) चढ़ेगा !! और माँ ब्राह्मणी के आदेशानुसार उन्हें फल फूल मिठाइयां चढ़ाई जाती है !!
* इसी लिए पहले के समय मदिरा के अलावा रक्त का प्रसाद भी चढ़ता था !!
धन्य है वो डाकू जो माँ को इतने सच्चे मन से पुकारा की उन्हें दर्शन दे दिया !!
और इसी चमत्कार को नमस्कार करते हुए डाकुओं ने दृढ़ संकलप लिया के वे यहाँ माँ के भव्य मंदिर का निर्माण करेंगे और ६० वर्षों तक भक्ति में लीन हो कर उन्हों ने माँ का अद्भुत मंदिर खड़ा किया !! और विक्रम संवत १११९ में मंदिर का निर्माण कार्य पूरा हुआ !! माँ की भक्ति की शक्ति ही प्राप्त थी उन्हें इसी लिए बिना किसी औजार व् वाहन के साधन के भी पांच पांच हज़ार किलो तक के पत्थर को बिना चुना और सीमेंट के जोड़ दिया !! और बेजोड़ नकाशी का कार्य जो आज हम बिना आधुनिक उपकरण के हम सोच भी नहीं सकते उन्होंने साकार कर दिया !! माँ के पुण्य प्रताप से उन्होंने अपने छुपने के लिए माँ के पास ही रहना सबसे उत्तम समझा इसीलिए माँ के निज आले के ऊपर ही एक गुफा बनायीं जो की आज भी विधमान है !!
इसके पश्च्यात मंदिर में कई बदलाव भक्तो द्वारा समय समय पे किये गए !
माँ आज भी अपने बच्चों से प्रसन होकर तामसिक भोग लगाती है और सभी इच्छाएं पूर्ण करती है !!
यह हमारे पूर्व जनम के संस्कार ही है के हमें माँ के चरणो में ठिकाना मिला और माँ ने हमे (राजपूत/ बैंगाणी/ अन्य ओसवाल /झांझरा......)को अपने कुल में पैदा किया !! ऐसी कुल धिराणी पा के हम तो धन्य हो गए !! माँ यो ही हम पर मेहर बरसाती रहे और हम यु ही माँ की भक्ति में दुबे रहे ...इसी के साथ

" काळी कल्याणी मावड़ी , लेह ढ़ाई प्याला रो भोग ।
ब्राह्मणी बेठी साथ में , भजिया मिटे सब रोग ।। "

जय श्री बाण माताजी
जय श्री कालिका माताजी
जय श्री सोनाणा खेतलाजी
जय श्री एकलिंग नाथ जी

Saturday, 26 December 2015

माँ ब्राह्मणी मंदिर - राजा सुरथ से जुड़े इतिहास

मां ब्राह्मणी मंदिर : राजा सूरथ से जुड़े हैं इतिहास
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जय माँ बाण/बायण/ब्राह्मणी माताजी
हनुमानगंज (बलिया) : जिला मुख्यालय से पांच किमी उत्तर बलिया-सिकंदरपुर मुख्य मार्ग पर ब्रह्माइन गांव स्थित मां ब्राह्मणी देवी का प्राचीन मंदिर श्रद्धालुओं के बीच आस्था का केंद्र ¨बदु बना हुआ है। मान्यता है कि सच्चे मन से जिस किसी ने कुछ मांगा, उसकी मनोकामना जरूर पूरी होती है। नवरात्र में ही नहीं बल्कि अन्य अवसरों पर भी दर्शन-पूजन को दूर-दराज से लोग यहां आते हैं। दुर्गा सप्तशती व मारकंडेय पुराण में वर्णित है कि भवन के राजाओं से हार कर राजा सूरथ कुछ सैनिकों के साथ शिकार खेलने के बहाने निकल गए। आज जहां ब्रह्माइन गांव स्थित है कालांतर में वहां जंगल था। वहीं रुके और सैनिकों से पानी लाने को कहे। सैनिकों को कुछ दूर चलने पर एक सरोवर दिखाई दिया। वहां से पानी लाकर उन्होंने राजा को दिया। राजा युद्ध में घायल हो गए थे और शरीर के कई जगह से मवाद निकल रहा था। राजा ने जब उस पानी का स्पर्श किया तो वहां का कटा व मवाद युक्त घाव ठीक हो गया। इस घटना से चकित राजा ने सैनिकों को उस स्थान पर ले चलने को कहा जहां से वे जल लाए थे। वहां पहुंचने के बाद राजा ने उस सरोवर में छलांग लगा दी जिससे उनका पूरा शरीर सोवरन हो गया वहां पर राजा ने विचार किया कि निश्चय ही ये स्थान कोई पवित्र जगह है। सैनिकों को भेजकर राजा अकेले ही विचरण करने लगे वहीं पर उन्हें एक आश्रम दिखाई दिया वह आश्रम महर्षि मेधा का था। महर्षि से उचित सत्कार पाकर राजा उनके आश्रम में विचरण करने लगे। कुछ दिनों बाद वहां पर एक समाधि नाम का वैश्य आया जिसे उसके परिजनों ने धन के लोभ में घर से निकाल दिया था। राजा सूरथ व समाधि ने ऋषि मेधा से शांति पाने का उपाय पूछा। ऋषि ने आदि शक्ति की उपासना को कहा। वहीं पर राजा सूरथ व समाधि ने तीन वर्षों तक मां ब्रह्माणी की तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर मां ब्रह्माणी देवी अवतरित हुई दोनों को मनोवांछित फल देकर अभिलाशित किया। राजा सूरथ की तपोस्थली सुरहा के नाम से विख्यात हुई और उससे निकलने वाला एक मात्र नाला जिसके जल से राजा का कोढ़ जैसा शरीर सुंदर हो गया, वह कटहल नाले के नाम से विख्यात हुआ।

Sunday, 29 November 2015

श्री ब्राह्मणी माताजी की पल्लू में होने वाली आरती

श्री ब्राह्मणी माता जी पल्लू ( हनुमानगढ़ , राज.)
श्री ब्राह्मणी माताजी के पल्लू स्थित मंदिर में होने वाली आरती

श्री ब्रह्माणी माता जी की आरती

जय अम्बे गौरी, मइया जय आनन्द करनी ।
तुमको निश-दिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिव री ॥
मांग सिंदूर विराजत, टीको मृग मद को ।
कमल सरीखे दाऊ नैना, चन्द्र बदन नीको ॥
कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै ।
रक्त पुष्प गलमाला, कण्ठन पर साजै ॥
केहरि वाहन राजत, खड़ग खप्पर धारी ।
सुर-नर-मुनि-जन-सेवत, सबके दुखहारी ॥
कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती ।
कोटिक चन्द्र दिवाकर, राजत सम ज्योति ॥
शुम्भ निशुम्भ विडारे, महिषासुर - घाती ।
धूम्र विलोचन नैना, निश दिन मदमाती ॥
चण्ड मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे ।
मधु कैटभ दोऊ मारे, सुर भय हीन करे ॥
ब्रह्माणी, रुद्राणी, तुम कमला रानी ।
आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी ॥
चौसठ योगिनी गावत, नृत्य करत भैरुं ।
बाजत ताल मृदंगा, और बाजत डमरुँ ॥
तुम हो जग की माता, तुम ही हो भरता ।
भक्तन् की दुःख हरता, सुख-सम्पत्ति करता ॥
भुजा अष्ट अति शोभित, वर मुद्रा धारी ।
मन वांछित फल पावे, सेवत नर नारी ॥
कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती ।
श्री पल्लू कोट में विराजत, कोटि रतन ज्योति ॥
श्री अम्बे भवानी की आरती, जो कोई नर गावे ।
कहत शिवानन्द स्वामी, सुख सम्पत्ति पावे ॥
जय अम्बे गौरी, मइया जय आनन्द करनी ।
तुमको निश-दिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिव री ॥

जय श्री ब्राह्मणी माताजी
जय श्री सोनाणा खेतलाजी
जय श्री एकलिंग नाथ जी

श्री ब्राह्मणी माताजी पल्लू राजस्थान के ब्लॉग से साभार

Wednesday, 18 November 2015

श्री बाण माताजी की महाराणा प्रताप को सहायता

"श्री बाण माताजी ने महाराणा प्रताप को दिया था चमत्कार "
मित्रो सभी को जय माँ बायण की अरज होवे सा.......महाराणा प्रताप व अकबर की एक कहानी जो मैने पापा हुकुम से सुनी थी, बहुत दिनो से सोच रहा था आप स्भी के साथ शेयर करु, आखिर कर आज शेयर कर ही देता हुँ....बात उन दिनो कि है जब महाराणा प्रताप एवम अकबर के बीच युध्य चल रहा था, ,महाराणा प्रताप अकबर की तलाश मे वनो मे भटकते हुए उज्जैन नगरी मे पहुंच गये वहा वे एक गाँव से गुजर रहे थे तभी वहा एक महिला महाराणा प्रताप को देख कर म आवभगत करती ह तथा महाराणा से निवेदन करती हे किआप मेरे घर पधार कर विश्राम करे, महाराणा काफी थक चुके थे अत:वे उस महिला के घर जाने के लिये तैयार हो गये जब महाराणा वहा पहुँचते है तो महिला महाराणा के लिये बिस्तर लगाती है तथा आराम फरमाने का निवेदन करती हुई कहती है कि आप जैसे महाराणा के चरण मेरे घर पर पडने से मै धन्य हो गई, यह मेरा सौभाग्य है कि आप मेरे घर पधारे.... और निवेदन करती है कि आप काफी थक चुके है और आपको भुख भी लगी होगी अत: मेरा पास के गाँव मे निमंत्रण हे मे वहा जाकर भोजन कर आप के लिये थाल लेकर आती हुँ तब तक आप विश्राम करे मै अभी गयी और अभी आयी......महाराणा की आज्ञा लेकर वह महिला प्रस्थान करने के लिये घर से बाहर निकलती है तथा परकोटे के उपर चढ कर बाज का रुप धारण कर वहा से उड जाती है ।वह महिला पास के गाँव मे शादी समारोह मे पहुँच कर महिला का रुप धारण कर लेती है तथा सभी सामाजिक रीती रिवाज को पुरा कर भोजन ग्रहण करती है व महाराणा के लिये थाल परोसकर वापिस बाज का रुप धारण कर उड जाती है तथा वापिस उसी परकोटे पर पहुच कर महिला का रुप धारण कर लेती है महाराणा प्रताप घर मे आराम करते हुए उस दृश्य को देख रहे थे (वह महिला डाकिनी/ तांत्रिक थी) ......तथा महाराणा को भोजन परोसकर प्रेम पुर्वक भोजन कराने के बाद महाराणा को पधारने का प्रयोजन पुँछती है तब महाराणा कहते है कि अकबर हाथ धोकर मेरे पिछे पडा है तथा वह मुझे अपने अधीन करना चाहता है लेकिन मुझे उसकी अधीनता स्वीकार नही है व मै अकबर की तलाश मै निकला हुआ हुँ.... वह महिला महाराणा से निवेदन करती है कि यदि आपकी आज्ञा हो तो मै आपको अकबर के पास ले जाकर छोड दु । महाराणा उसकी बात से सहमत हो जाते है तो वह महिला फिर से बाज का रुप धारण कर महाराणा प्रताप को अपने उपर बैठा कर उडती हुई अकबर के तम्बु के उपर पहुँचती है महाराणा वहा देखते है कि वहा तम्बु के चारो ओर कठोर पहरा है व अकबर के सैनिक तम्बु के चारो ओर चक्कर लगा रहे है व अकबर अपनी बेगम के साथ आराम से सो रहा है । महाराणा तम्बु के उपर से छेद कर अकबर के तम्बु मे प्रवेश करते है , अकबर गहरी निन्द मे सो रहा था महाराणा अकबर के समीप जा कर ...........अकबर का वध करने के लिये तलवार उपर उठाते हे तभी अचानक आवाज आती है
ठहर
महाराणा वहा रुक कर चारो तरफ देखते है वहा कोई नही था.......महाराणा फिर से अकबर का वध करने के लिये तलवार उपर उठाते हे तभी फिर से आवाज आती है
ठहर
महाराणा के फिर से चारो तरफ देखने पर वहा कोई नही था....
महाराणा तिसरी बार अकबर का वध करने के लिये तलवार उपर उठाते हुए सोचते है कि शायद मेरी अंतर आत्मा मुझे इस कार्य को करने के लिये रोक रही है ईसलिये शायद यह आवाज मुझे अनायास ही सुनाई दे रही है व महाराणा मजबुत ईरादे के साथ तिसरी बार तलवार उठाते है तो फिर से ठहर की आवाज आती है......महाराणा ने रुक कर कहा कौन हे तब आवाज आयी हम अकबर के 24 पीर है अकबर ईस समय आराम कर रहा है अत: हम उसकी रक्षा कर रहे है.....उस समय महाराणा प्रताप को क्रोध आता है क्योंकि वो अकबर की कुटनीती से तंग आ चुके थे व भुखे प्यासे वन मे भटक रहे थे व अपने अकेले होने के अहसास पर गुस्से मे कहते है कि तुम अकबर के पीर अकबर की रक्षा कर रहे हो तो मेरी माँ कहाँ गयी......तभी अकबर के पीर ही बोले पिछे मुड कर देख.....
जैसे ही महाराणा पिछे मुडे वहाँ कुलदेवी माँ मौजुद थे और उन्हौने महाराणा से कहाँ कि आप अकबर का वध मत करो सोये हुए व निहत्थो पर वार करना क्षत्रिय धर्म के खिलाफ है आप अपने यहाँ आने की कोई निशानी अकबर के पास छोड जाओ......तब महाराणा अकबर की एक मुंछ काट कर खत लिख कर अकबर के तकिये के निचे रख देते हे कि मै महाराणा प्रताप तेरे पास आया था व अगर मै चाहता तो तेरा वध कर देता लेकिन तुझे चेतावनी दे कर छोड रहा हु तु अपने डेरे समेट ले और यहा से रवाना हो जा.....तब से अकबर रोज निन्द मे महाराणा प्रताप आये उस डर से उचक कर खडा हो जाता तभी से किवन्द्ती है कि

"अकबर सोतो ओझके जाण सिराणे साप"

तो मित्रो सार यह है कि जंग कितनी भी बडी हो हम मेहनत, संघर्ष व माँ के आर्शीवाद से नेक रस्ते पर चलते हुए जीत सकते है माँ तो हमेशा हमारी साथ है लेकिन रास्ते हमारे खराब हे.....

भालों अरि चेतक असवारी , बायण चाले संग ।
भोम भूप ने अति प्यारी , राण प्रताप ने रंग ।।

अकबर मारण पाथळ गया , अध् रात आगरा माहि ।
चौबीस पीर चोकिया , बायण आया उण ठाहि ।।

रक्षा कीन्ही पाथळ री , थू सेवक समर लड़ी ।
रक्षा थारी राखसु , पीछे पाथळ मैं खड़ी ।।

जय श्री बाण माताजी
जय श्री एकलिंग जी
जय श्री सोनाणा खेतलाजी
जय मेवाड़ जय महाराणा प्रताप

आभार : मयूर सिंह जी चुण्डावत ( डूंगरपुर )

Monday, 16 November 2015

श्री बाण माताजी मंदिर दुजाणा ( पाली , राज.)

श्री बाण माताजी दुजाणा ( पाली , राज.)
पाली जिले के सांडेराव के पास स्थित गाँव दुजाणा में श्री बाण माताजी का यह मंदिर आया हुआ है ।
मंदिर में श्री बाण माताजी के साथ प्रभु श्री एकलिंग नाथ जी भी बिराजमाम हैं , मंदिर में बिराजमान आनंदमयी अद्भुत  श्री बाण माताजी की यह प्रतिमा के दर्शन मात्र से ही जीवन धन्य हो जाता है । माँ की लीला अपरम्पार है , भक्तों के दुःख सुख में सदा सेवक की सहायता हेतु एक पुकार पर माँ आ जाते है ।
महामाया मातेश्वरी श्री बाण/बायण/ब्राह्मणी/बाणेश्वरी माताजी आपकी सदा जय हो।

" चित्तोड़ चाल्या मावड़ी , आया गाँव दुजाणा ।
धनुष बाण धारण करी , बायण मात बखाणा ।।

जय श्री बाण माताजी :)
जय श्री सोनाणा खेतलाजी :)
जय श्री एकलिंग नाथ जी :)

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